श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.4.21 
यन् मद्-विषयकं तस्य
लालनादि प्रशस्यते
मन्यते मायिकं तत् तु
कश्चिल् लीलायितं परः
 
 
अनुवाद
तुम मेरी स्तुति इसलिए करते हो क्योंकि उन्होंने मुझे दुलारा और स्नेह के अन्य लक्षण दिखाए। लेकिन कुछ लोग ऐसे स्नेहपूर्ण व्यवहार को माया का मिथ्या प्रदर्शन मात्र मानते हैं, और कुछ लोग इसे उनकी लीलाओं का प्रदर्शन मात्र मानते हैं।
 
You praise me because he caressed me and showed me other signs of affection. But some people consider such affectionate behavior to be merely a false display of Maya, and some people consider it to be merely a display of his pastimes.
तात्पर्य
शंकराचार्य संप्रदाय के अद्वैतवादी भगवान व्रह्म व उनके भक्तों के प्रेमपूर्ण व्यवहार को भ्रम समझते हैं। अद्वैतवादी मानते हैं कि परम सत्य स्वयं को इस प्रकार के द्वंद्व में नहीं उलझा सकते हैं। किंतु अन्य, भक्ति संप्रदाय के वैष्णव, पुष्टि करते हैं कि ये भगवान के लीला हैं; भ्रम से बहुत परे, वे परम आध्यात्मिक हकीकत का स्वरूप हैं। ईश्वर परम सभी दैवी गुणों, साक्षी-ज्ञान-आनंद (अनंतता, ज्ञान और आनंद) के पूर्ण हैं और अपनी साक्षी-ज्ञान-आनंद शक्तियों की मदद से वे राहत से साक्षी-ज्ञान-आनंद-लीला में लीन हो सकते हैं। यहां श्री प्रह्लाद का विचार यह है कि भले ही भगवान का स्नेह का प्रदर्शन सत्य माना जाए, तो भी उन्होंने केवल अपने सुख को पूरा करने के लिए इस प्रकार का व्यवहार किया है। प्रह्लाद सोचते हैं कि भगवान नृसिंह ने सिर्फ उनकी फिक्र करने का दिखावा किया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)