कृष्णस्यानुग्रहो ’प्य् एभ्यो
नानुमीयेत सत्तमैः
स चाविर्भवति श्रीमन्न्
अधिकृत्यैव सेवकम्
अनुवाद
केवल इन लक्षणों से श्रेष्ठ संत यह निष्कर्ष नहीं निकालते कि कृष्ण ने किसी व्यक्ति पर कृपा की है। हे नारद, कृष्ण की कृपा केवल सच्चे सेवक में ही प्रकट होती है।
Great sages do not conclude from these characteristics alone that Krishna has bestowed His grace upon a person. O Narada, Krishna's grace is manifested only in a true devotee.
तात्पर्य
सबसे उन्नत संत शुद्ध वैष्णव हैं, जो श्रीकृष्ण के चरण कमलों की भक्ति सेवा की शक्ति समझते हैं। "मुझे कृष्ण की विशेष दया नहीं मिल सकती थी," प्रह्लाद कहते हैं, "क्योंकि वह केवल उसी भक्त को देते हैं जो उसके लायक होता है। नारद, आपको भगवान की आंतरिक शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त है। आपको उनकी कृपा प्राप्त हुई है। इसलिए आप अच्छी तरह जानते हैं कि केवल एक उचित उम्मीदवार ही इसे प्राप्त कर सकता है। भगवान की दया अनंत है, समय और स्थान की सीमाओं से परे है, लेकिन भौतिक दुनिया में यह केवल कुछ निश्चित समय पर कुछ उपयुक्त भक्तों में ही दिखाई देता है।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥