श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.4.14 
इतः प्रभृति कर्तव्यो
निवासो नियतो ’त्र हि
मयाभिभूय दक्षादि-
शापं युष्मत्-प्रभावतः
 
 
अनुवाद
अब से मैं यहीं स्थायी रूप से आपके साथ रहने का इरादा रखता हूँ। आपकी शक्ति से मैं दक्ष आदि से प्राप्त शापों का निवारण अवश्य कर सकूँगा।
 
From now on, I intend to stay here permanently with you. With your power, I will surely be able to remove the curses I received from Daksha and others.
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