श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.4.113 
राजसूयाश्वमेधादि-
महा-पुण्यार्जितास् तथा
विष्णु-लोकादयो ’त्रापि
जम्बु-द्वीपाधिराजता
 
 
अनुवाद
राजसूय और अश्वमेध जैसे यज्ञों द्वारा उन्होंने भगवान विष्णु के लोक को प्राप्त करने लायक पुण्य अर्जित किया है। और इस लोक में रहते हुए भी वे सम्पूर्ण जम्बूद्वीप पर शासन करते हैं।
 
Through sacrifices like Rajasuya and Ashwamedha, he has accumulated enough merit to attain the abode of Lord Vishnu. While still in this abode, he rules over the entire Jambudweep.
तात्पर्य
वैदिक यज्ञों से सामान्यतः यज्ञ करने वालों को भौतिक लाभ मिलते हैं, स्वर्ग की प्राप्ति तक। परन्तु क्योंकि युधिष्ठिर ने राजसूय और अश्वमेघ यज्ञ शुद्ध कृष्ण चेतना में किये, और सभी फल श्री कृष्ण को समर्पित किए, इसलिये युधिष्ठिर को जो लाभ प्राप्त हुए वो आध्यात्मिक थे। यज्ञीय अनुष्ठानों में उनकी सहभागिता से सिर्फ़ उनके कृष्ण के लिये विशेष भक्ति में वृद्धि हुई। राजसूय और अश्वमेघ यज्ञों को करने से, युधिष्ठिर को वैकुण्ठ में प्रवेश करने का विशेषाधिकार प्राप्त हुआ। इस विशेषाधिकार में स्वतः ही, इन्द्र के स्वर्गीय लोक और हर दूसरे भौतिक लोक में जाने का अधिकार शामिल हो गया। वैकुण्ठ में जीवन के आनंद में स्वतः ही स्वर्गलोक आदि में मिलने वाले सारे आनंद शामिल हैं। और अगले जन्म के इन लाभों के अतिरिक्त, युधिष्ठिर इस जन्म में भी समृद्ध हुए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)