अपिपलद धर्म-राजः
पितृ-वद रंजयन प्रजाः
निःस्पृहः सर्व-कामेभ्यः
कृष्ण-पादानुसेवया
"सम्राट युधिष्ठिर ने अपने शासन के दौरान सभी को उदारतापूर्वक प्रशासित किया। वे बिल्कुल अपने पिता की तरह थे। उनकी कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं थी और भगवान, श्री कृष्ण के चरण कमलों की निरंतर सेवा के कारण वे सभी प्रकार के इंद्रिय तृप्ति से मुक्त थे।" (भागवतम 1.12.4)
रंजयन प्रजाः ("नागरिकों को संतुष्ट करना") का अर्थ यह नहीं है कि युधिष्ठिर महाराज ने उन्हें रोटी और सर्कस या एक तेजी से बढ़ती भौतिकवादी अर्थव्यवस्था से शांत किया। इसका अर्थ है कि उन्होंने उन्हें कृष्ण चेतना बनने के लिए प्रोत्साहित किया और उस उद्देश्य की दिशा में सभी व्यावहारिक व्यवस्थाएँ कीं। शुद्ध भक्ति सेवा का आनंद सभी मनुष्यों के लिए संतुष्टि का एकमात्र वास्तविक स्रोत है। जैसा कि नारद श्री हरि-भक्ति-सुधोदय (1.51) में शौनक ऋषि को बताते हैं:
अहो अति-धन्यो सि यतः समस्तो
जनस त्वयेश प्रबलि-कृतो यम
उत्पादयेद यत्र भवार्वितानां
भक्तिं हरौ लोक-पिता स धन्यः
"आह, आप अति अत्यंत भाग्यशाली हैं, क्योंकि पूरी आबादी आपके द्वारा आध्यात्मिक रूप से सशक्त हो रही है। समाज का वास्तव में भाग्यशाली नेता वह है जो भौतिक अस्तित्व में तड़ित लोगों के हृदय में भगवान हरि के लिए भक्ति पैदा कर सकता है।"
इस प्रकार सूत गोस्वामी राजा युधिष्ठिर के बारे में आगे कहते हैं:
समपदः क्रतवो लोका
महिषी भ्रातरो मही
जम्बू-द्वीपादिपत्यं च
यशस च त्रि-दिवं गतम्
किं ते कामाः सुर-स्पार्हा
मुकुंद-मनसो द्विजाः
अधिजहरुद मुदं राज्ञः
क्षुधितस्य यथारे
"महाराज युधिष्ठिर की प्रसिद्धि, उनकी रानी, उनके कट्टर भाइयों, उनकी विशाल भूमि, उनके सांसारिक अधिकार, पृथ्वी ग्रह पर उनकी संप्रभुता और बलिदान जिसके द्वारा वे एक बेहतर गंतव्य प्राप्त करेंगे, की खबर स्वर्गीय ग्रहों तक भी पहुंची। हे ब्राह्मणों, राजा का वैभव इतना आकर्षक था कि स्वर्ग के निवासी इसकी आकांक्षा करते थे। लेकिन क्योंकि वे भगवान की सेवा में लीन थे, उनके सिवा भगवान की सेवा को छोड़कर कुछ भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सकता था।" (भागवतम 1.12.5-6)
वैदिक सभ्यता में, एक राज्य के शासक को सरकार और अपने निजी घराने को बनाए रखने के लिए नागरिकों की कुल संपत्ति का छठा हिस्सा दावा करने का अधिकार था। एक राजा को लोगों की कर्म प्रतिक्रिया का छठा हिस्सा भी प्राप्त होता है, जो पाण्डवों जैसे पवित्र क्षेत्र में एक अच्छा कर्म का एक बड़ा भंडार था।
राजा युधिष्ठिर के नेतृत्व का अनुसरण करते हुए, उनके छोटे भाइयों ने उन्हें राज्य पर शासन करने में मदद की लेकिन वे भौतिक भोग के प्रति आकर्षित नहीं हुए। पाँचों भाई अपनी सहकारी भावना और मानव सभ्यता के सर्वोच्च सिद्धांतों को बनाए रखने के अपने उत्साह के लिए सार्वभौमिक रूप से प्रसिद्ध हैं।
