श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.4.10 
यः स्व-प्रभु-प्रीतिम् अपेक्ष्य पैतृकं
राज्यं स्वयं श्री-नरसिंह-संस्तुतौ
सम्प्रार्थिताशेष-जनोद्धृतीच्छया
स्वी-कृत्य तद्-ध्यान-परो ’त्र वर्तते
 
 
अनुवाद
अपने प्रभु के प्रेम के प्रति समर्पित होकर, आपने अपने पिता का सिंहासन ग्रहण करना स्वीकार किया। और जैसा कि आपने अपनी प्रार्थनाओं में भगवान नृसिंह से कहा था, ऐसा करके आप सभी लोगों का उद्धार करना चाहती हैं। आप अभी भी उस राजसी आसन पर भगवान नृसिंह के ध्यान में लीन हैं।
 
Devoted to the love of your Lord, you accepted your father's throne. And as you had told Lord Narasimha in your prayers, by doing so you wished to save all people. You still sit on that majestic throne, absorbed in meditation on Lord Narasimha.
तात्पर्य
भगवान के बिना शर्त प्रेम को ध्यान में रखते हुए, प्रह्लाद अंततः अपने पिता के सिंहासन पर बैठने के लिए तैयार हो गया। वह हिरण्यकशिपु के राज्य के विशाल धन का उपयोग प्रचार के लिए करना चाहता था। यदि वह विश्व में प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार की व्यवस्था कर सकता है, तो प्रह्लाद ने अनुमान लगाया कि इससे भगवान को संतुष्टि मिल सकती है।

यह निश्चित रूप से अजीब लगता है कि प्रह्लाद ने पहले आध्यात्मिक राज्य की पदोन्नति से इनकार कर दिया लेकिन बाद में भौतिक दुनिया में सीमित राज्य को स्वीकार कर लिया। लेकिन प्रह्लाद ने यह विशेष लालसा के कारण किया- दुनिया के लोगों को उनकी दुर्दशा से मुक्त करने की उसकी इच्छा। वह इस बात को लेकर चिंतित नहीं था कि राजनीति में शामिल होने से उसके आध्यात्मिक हितों को खतरा होगा, क्योंकि उसे विश्वास था कि भगवान के व्यक्तित्व पर उसका अखंड ध्यान हमेशा उसकी रक्षा करेगा। इस प्रकार प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह से प्रार्थना की:

एवं स्व-कर्म-पतितं भव-वैतरण्याम्

अन्योन्य-जन्म-मरणाशन-भोता-भोतम्

पश्यं जनं स्व-परा-विग्रह-वैर-मैत्रम्

हन्तेति पार-चर पिपृहि मूढम् अद्य

"हे मेरे प्रभु, आप हमेशा मृत्यु की नदी के दूसरी तरफ स्थित हैं, लेकिन हमारी अपनी गतिविधियों के कारण, हम यहां पीड़ित हैं। दरअसल, हम इस नदी में गिर गए हैं और बार-बार जन्म और मृत्यु के दर्द का सामना कर रहे हैं और भयानक चीजें खा रहे हैं। अब कृपा करके हम पर करुणा करें- न केवल हम पर बल्कि उन सभी पर जो पीड़ित हैं- और दया और करुणा से हम सभी को मुक्त करें तथा हमारा भरण-पोषण करें।" ( भागवतम 7.9.41 )

भौतिक अस्तित्व वैतरणी नदी की तरह है, मृत्यु के दरबार का द्वार। सामान्य तौर पर, पृथ्वी पर भौतिक जीवन दुखों से भरा है, नरक के भूमिगत क्षेत्रों में जीवन से कम नहीं। इसलिए, हालांकि इन खतरों से सुरक्षित, हमारे लाभ के लिए प्रह्लाद बोलता है जैसे कि विभिन्न जन्मों और मौतों की अपेक्षित परेशानियों से डर रहा हो, और वह खुद को ज्यादातर लोगों की तरह मूर्ख के रूप में प्रस्तुत करता है, जो एक दूसरे के साथ दुश्मन या दोस्त के रूप में व्यवहार करते हैं। सभी परिस्थितियों में भ्रमित होते हैं।

प्रह्लाद भगवान नृसिंह को पार-चर के रूप में संबोधित करता है, वह जो वैतरणी नदी के दूसरी तरफ स्थित है, या दूसरे शब्दों में, वैकुंठ के शाश्वत मुक्त राज्य में। भौतिक दुनिया में अन्य आत्माओं की पीड़ा को देखकर अपने दुख को व्यक्त करते हुए, प्रह्लाद भगवान से अनुरोध करता है कि कृपया उन्हें वैतरणी से सुरक्षित पार कराएँ। फिर वह प्रार्थना करता है:

को न्व अत्र ते 'खिला-गुरो भगवन प्रयासो

उत्तारणे 'स्य भव-सम्भव-लोप-हेतोः

मूढेषु वै महाद-अनुग्रहो आर्त-बन्धो

किं तेना ते प्रिय-जनान अनुशेवतां नः

"हे मेरे प्रभु, हे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, पूरी दुनिया के मूल आध्यात्मिक गुरु, आपके लिए क्या कठिनाई है, जो ब्रह्मांड के मामलों का प्रबंधन करते हैं, आपकी भक्ति सेवा में लगी गिरी हुई आत्माओं को मुक्त करने में? आप सभी पीड़ित मानवता के मित्र हैं, और महान व्यक्तित्वों के लिए मूर्खों पर दया दिखाना आवश्यक है। इसलिए मुझे लगता है कि आप हम जैसे लोगों पर अपनी दया करेंगे, जो आपकी सेवा में लगे हुए हैं।" ( भागवतम 7.9.42 )

यहाँ प्रह्लाद भगवान नृसिंह को सभी आत्माओं के आध्यात्मिक गुरु के रूप में संबोधित करते हैं, जिसका अर्थ है कि बिना किसी अपवाद के सभी पर दया दिखाना उनके लिए बिल्कुल उपयुक्त है। भगवान के लिए अस्तित्व में प्रत्येक आत्मा को मुक्त करना कोई महान प्रयास नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मांडों को सिर्फ एक खेल के रूप में बनाता, बनाए रखता और नष्ट करता है। और प्रह्लाद जैसे अपने स्वयं के भक्तों और उनके सेवकों को मुक्त करना भगवान के लिए और भी कम कठिन होना चाहिए, जो खुद को एक गिरी हुई दानव मानता है जिसके पास नारद मुनि का वफादार शिष्य होने की एक अच्छी योग्यता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)