श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.3.85 
तद् गत्वा सुतले शीघ्रं
वर्धयित्वाशिषां गणैः
प्रह्लादं स्वयम् आश्लिष्य
मद्-आश्लेषावलिं वदेः
 
 
अनुवाद
जल्दी से सुतल के पास जाओ। प्रह्लाद को अपने अनगिनत आशीर्वाद दो, उसे गले लगाओ और उससे कहो कि मैं तुम्हें बार-बार गले लगाता हूँ।
 
Go quickly to Sutala. Give Prahlada your countless blessings, embrace him, and tell him, "I embrace you again and again."
तात्पर्य
जब भगवान शिव वार्तालाप कर रहे थे तब प्रह्लाद तीसरे पाताल ग्रह सुतल पर थे जिसका शासन बलि महाराज करते थे। जब प्रह्लाद भगवान वामन के साथ बलि के आमने सामने की मुलाकात का साक्षी बने थे तब भगवान ने प्रह्लाद को सुतल लोक आने का आमंत्रण दिया था तथा वहां पर कुछ दिन उनके साथ बिताने को कहा था:

वत्स प्रह्लाद भद्रं ते

प्रयाहि सुतला लयं

मोद मानः स्व-पौत्रेण

ज्ञातीनां सुखमा वहा

नित्यं द्रष्टा सि माम तत्र

गदा पाणिं अवस्थितम्

मद दर्शन महाह्लाद-

ध्वस्त-कर्म-निबंधनः

"हे मेरे प्रिय पुत्र प्रह्लाद, आपको सौभाग्य प्राप्त हो। कुछ समय के लिए, कृपया सुतल नामक स्थान पर जाएँ और वहाँ अपने पौत्र और अपने अन्य रिश्तेदारों तथा मित्रों के साथ खुशी मनाएँ। आप वहाँ मुझे अपने सामान्य रूप में देख पाएंगे जहाँ मेरे हाथों में चक्र, गदा, कमल और शंख होंगे। मेरे व्यक्तिगत दर्शन से आपको जो दिव्य आनंद प्राप्त होगा उसके कारण आपको फलीभूत गतिविधियों से आगे कोई बंधन नहीं रहेगा।" (भागवतम 8.23.9-10)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)