वत्स प्रह्लाद भद्रं ते
प्रयाहि सुतला लयं
मोद मानः स्व-पौत्रेण
ज्ञातीनां सुखमा वहा
नित्यं द्रष्टा सि माम तत्र
गदा पाणिं अवस्थितम्
मद दर्शन महाह्लाद-
ध्वस्त-कर्म-निबंधनः
"हे मेरे प्रिय पुत्र प्रह्लाद, आपको सौभाग्य प्राप्त हो। कुछ समय के लिए, कृपया सुतल नामक स्थान पर जाएँ और वहाँ अपने पौत्र और अपने अन्य रिश्तेदारों तथा मित्रों के साथ खुशी मनाएँ। आप वहाँ मुझे अपने सामान्य रूप में देख पाएंगे जहाँ मेरे हाथों में चक्र, गदा, कमल और शंख होंगे। मेरे व्यक्तिगत दर्शन से आपको जो दिव्य आनंद प्राप्त होगा उसके कारण आपको फलीभूत गतिविधियों से आगे कोई बंधन नहीं रहेगा।" (भागवतम 8.23.9-10)
