श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 82-83
 
 
श्लोक  1.3.82-83 
मर्यादा-लङ्घकस्यापि
गुर्व्-आदेशाकृतो मुने
असम्पन्न-स्व-वाग्-जाल-
सत्यतान्तस्य यद् बलेः

द्वारे तादृग् अवस्थानं
तुच्छ-दान-फलं किम् उ
रक्षणं दुष्ट-बाणस्य
किं नु मत्-स्तव-कारितम्
 
 
अनुवाद
हे प्रिय ऋषिवर, बलि ने अपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करके और अपने वचनों का पालन न करके आध्यात्मिक शिष्टाचार का उल्लंघन किया। फिर भी, जैसा कि हम जानते हैं, भगवान बलि के द्वार पर पहरेदार बनने को तैयार हो गए। क्या यह केवल बलि के तुच्छ दान का फल था? भगवान ने दुष्ट बाण को भी सुरक्षा प्रदान की। क्या यह मेरे द्वारा भगवान की स्तुति करने का परिणाम था?
 
O dear sage, Bali violated spiritual etiquette by disobeying his guru and not keeping his word. Yet, as we know, the Lord agreed to guard Bali's door. Was this merely a result of Bali's meager donation? The Lord also provided protection to the wicked Bana. Was this a result of my praising the Lord?
तात्पर्य
क्योंकि भगवान के व्यक्तित्व ने बली महाराज को अपना द्वारपाल बनाकर कृतार्थ किया, कोई बता सकता है कि बली को प्रह्लाद से अधिक दया मिली। लेकिन भगवान शिव के अनुसार यह सत्य नहीं है। बल्कि भगवान विष्णु ने बली का पक्ष केवल इसलिए लिया क्योंकि बली प्रह्लाद का पोता था। देवताओं के विरुद्ध असुरों के लिए लड़ते हुए बली ने ब्रह्मा द्वारा निर्धारित ब्रह्मांड के नियम का उल्लंघन किया कि देवताओं को स्वर्ग पर शासन करना चाहिए, असुरों को पाताल-लोका का। स्वर्ग पर आक्रमण करके, इंद्र के सिंहासन पर अधिकार करके, और विभिन्न देवताओं के पदों को असुरों को देकर बली ने इस प्राकृतिक क्रम का उल्लंघन किया।

बली ने अपने आध्यात्मिक गुरु शुक्राचार्य के विशिष्ट निर्देशों की भी अवहेलना की। शुक्र ने बली को चेतावनी दी थी कि वामनदेव को कुछ भी न दें, भले ही बली ने भगवान वामन को दान में अपने उपहारों की पसंद की पेशकश की हो। अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेश को न मानने के सबसे बुरे संभावित अपराध को करने से बली ने शुक्राचार्य का श्राप अर्जित किया। श्रील शुकदेव गोस्वामी ने भगवतम (8.20.14) में इसका वर्णन किया है:

एवं अश्रद्धितं शिष्य

अनादेशकरं गुरुः

शशाप दैवप्रहितः

सत्यसंघं मनस्विनम्

"आध्यात्मिक गुरु शुक्राचार्य, जो सर्वोच्च भगवान से प्रेरित थे, ने अपने महान शिष्य बली महाराज को श्राप दिया, जो इतने उदार और सत्य में निश्चित थे कि आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का सम्मान करने के बजाय वह उनकी अवज्ञा करना चाहते थे।"

भगवान वामन को देने के लिए सहमत होने के लिए शापित होने के बाद, बली वह दान भी नहीं दे सके जो उन्होंने दिया था। वामनदेव ने केवल दो चरणों से पूरे ब्रह्मांड को ढँक दिया, और कोई भूमि नहीं बची जहाँ वह अपना तीसरा स्थान रख सकें। इस प्रकार दान का वादा करने वाले बली के सुरुचिपूर्ण शब्द एक खोखला वादा बन गए। उन्होंने भगवान से कहा था:

यद्यद् वटो वाँछसि तत् प्रतीच्छ मे

त्वाम अर्थिनं विप्र-सुतानु तर्काये

गां कांचनं गुणवद् धाम मृष्टं

तथान्नपयं उतवा विप्र-कन्याम्

ग्रामान् समृद्धांस्तुरागां गजान्वा

रथान् तथा रहततम सम्प्रतीच्छ

"हे ब्राह्मण के पुत्र, ऐसा प्रतीत होता है कि आप मुझसे कुछ मांगने यहाँ आए हैं। इसलिए, जो चाहो वह तुम मुझसे ले सकते हो। हे पूजनीयों में श्रेष्ठ, तुम मुझसे गाय, सोना, घोड़े, हाथी, रथ, एक सुसज्जित घर, समृद्ध गाँव, स्वादिष्ट भोजन और पेय, अपनी पत्नी के लिए एक ब्राह्मण की पुत्री या जो कुछ भी तुम्हारी इच्छा हो वह ले सकते हो।" (भागवतम 8.18.32) जब वामनदेव ने एक अनुरोध प्रस्तुत किया जो बहुत विनम्र लग रहा था, तो बली ने उस पर हँसा और कहा:

अहो ब्राह्मण दायदा

वाचस्ते वृद्धसंमताः

त्वं बालो बालिशमति

स्वार्थं प्रत्य बुद्धो यथा

"हे ब्राह्मण के पुत्र, आपके निर्देश विद्वान और बुजुर्ग व्यक्तियों के समान ही अच्छे हैं। फिर भी, आप एक लड़के हैं, और आपकी बुद्धि अपर्याप्त है। इस प्रकार आप अपने स्वार्थ के संबंध में बहुत विवेकपूर्ण नहीं हैं।" (भागवतम 8.19.8) और जब वामनदेव ने जोर देकर कहा कि वह तीन चरणों से अधिक भूमि नहीं चाहता है, तो बली ने विश्वास के साथ उत्तर दिया। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (8.19.28) में कहा गया है:

ईत्युक्तः सहसन प्राहा

वाँछताः प्रतिगृह्यताम्

"जब भगवान ने इस प्रकार कहा, तो बली ने मुस्कुराया और उससे कहा, 'ठीक है। जो चाहो ले लो।' परन्तु जब उसका वचन पूरा करना असंभव सिद्ध हुआ, तो ये घमंडी शब्द बली के लिए शर्मिंदा होने का कारण बन गए।

ऐसा लगता है कि बली ने बहुत महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं दिया, केवल तीन महत्वहीन भौतिक दुनिया और फिर उसका अपना शरीर। पादं तृतीयं कुरु शीर्षण मे निजम: "कृपया अपने तीसरे कमल चरण मेरी छाती पर रखें।" (भागवतम 8.22.2) वामनदेव का बली का द्वारपाल बनना इस छोटे दान का परिणाम नहीं हो सकता है, भगवान शिव का प्रस्ताव है। भगवान ने बली के साथ इस तरह से किया होगा क्योंकि बली के दादा प्रह्लाद एक महान आत्मा थे और विष्णु के प्रिय भक्त थे। बली इस आशीर्वाद के पात्र नहीं थे, क्योंकि वे सार्वभौमिक व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले, अपने गुरु के आदेश का उल्लंघन करने वाले और वादे तोड़ने वाले थे। हम इस दुनिया में देखते हैं कि, एक सामान्य नियम के रूप में, बेकार की चीजों के बदले में कुछ भी महत्वपूर्ण प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए, बली के छोटे दान ने भगवान की प्राप्ति नहीं की होगी, जो शाश्वत ज्ञान और आनंद के अवतार हैं। उस दान के कारण निश्चित रूप से भगवान बाली के घर की टोली में प्रवेश नहीं कर पाते। बली की सौभाग्य की एकमात्र व्यवहार्य व्याख्या प्रह्लाद महाराज और उनके पूज्य भगवान के बीच प्रेम-भक्ति का अंतरंग आदान-प्रदान है।

बली के बचाव में, कोई शास्त्र के कथनों से तर्क दे सकता है कि प्रह्लाद ने बली को भगवान के लिए शुद्ध भक्ति के उपहार से आशीर्वाद दिया था और उस भक्ति के बल पर उसने भगवान को प्राप्त किया। एक और उदाहरण इसलिए यहां दिया गया है, जो बाणासुर का है, जो बहुत अधिक दुष्ट व्यक्ति था। प्रह्लाद के प्रति भगवान की करुणा के अलावा, बाण के मोक्ष का कोई कारण नहीं हो सकता है। बाण की ओर से भगवान शिव का हस्तक्षेप भी बाण की जान नहीं बचा सकता था जब कृष्ण उसे मारने वाले थे, न ही बाण अपनी सभी चार बाहों को हटाने की पूर्णता प्राप्त कर सकता था, न ही भगवान कृष्ण ने बाण को भगवान शिव का शाश्वत सहयोगी बनाया होता।

बाणासुर इतना दुष्ट था कि उसने अपने पूजा के पात्र भगवान शिव को भी चुनौती देने की हिम्मत कर दी:

नमस्ये त्वां महादेव

लोकानां गुरुमीश्वरम्

पुंसाम् अपूर्णकामानां

कामपूरमरांघृपम्

दोःसहस्रं त्वया दत्तं

परं भाराय मेऽभवत्

त्रिलोक्यां प्रतियोद्धारं

ना लभे त्वदृते समम्

"हे भगवान महादेव, मैं आपको नमन करता हूं, जो दुनिया के आध्यात्मिक गुरु और नियंत्रक हैं। आप स्वर्गीय पेड़ की तरह हैं जो उन लोगों की इच्छाओं को पूरा करते हैं जिनकी इच्छाएँ अधूरी हैं। ये एक हजार हाथ जो आपने मुझे दिए हैं, मेरे लिए केवल एक भारी बोझ बन गए हैं। तुम्हारे अलावा, मुझे तीनों लोकों में कोई ऐसा योग्य नहीं मिलता है जिससे मैं लड़ सकूँ।" (भागवतम 10.62.5-6) बाण ने भगवान विष्णु की भक्ति को भी त्याग दिया था जो उनके परिवार में पारंपरिक थी; इसके बजाय वह एक साधारण राक्षस की तरह वैष्णवों, देवताओं और ब्राह्मणों का दुश्मन बन गया। उसने भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध को गिरफ्तार किया, कृष्ण के खिलाफ लड़ाई लड़ी और विभिन्न पुराणों में वर्णित अन्य अपराध किए।

यहां भगवान शिव पूछते हैं, "क्या यह मेरी प्रार्थनाओं के कारण था कि श्रीकृष्ण ने बाण को उसकी सभी बकवासों के लिए माफ कर दिया?" बिल्कुल नहीं, भगवान शिव का आग्रह है। प्रह्लाद की सच्ची भक्ति के कारण ही भगवान कृष्ण ने बाणासुर का उद्धार किया। बाण द्वारा किए गए वैष्णवों जैसे अपराधों को केवल वैष्णवों की दया से ही मुक्त किया जा सकता है। यह प्रह्लाद की कृपा ही थी कि उनके पोते बाली और प्रपौत्र बाण के साथ भगवान ने कृपापूर्वक व्यवहार किया। भगवान ने उनके अपराधों को माफ कर दिया और उन्हें ऊपर उठाया, इसका एकमात्र कारण प्रह्लाद को प्रसन्न करना था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)