अहं भक्त-पराधीनो
ह्यस्वतंत्र इव द्विज
साधुभिर्गृस्त-हृदयो
भक्तैर्भक्त-जना-प्रियः
“मैं अपने भक्तों के पूर्ण नियंत्रण में हूँ। वास्तव में, मैं स्वतंत्र बिलकुल नहीं हूँ। क्योंकि मेरे भक्त भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह रहित हैं, मैं सिर्फ उनके हृदयों की गहराइयों में ही निवास करता हूँ। मेरे भक्तों की तो बात ही छोड़िए, मेरे भक्तों के भक्त भी मुझे बहुत प्रिय हैं।”
मयी निर्वद्ध-हृदयाः
साधवाः सम-दर्शिनः
वशे कुर्वन्ति माम भक्त्या
सत-स्त्रियाः सत्-पतिं यथा
“जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने सज्जन पतियों को सेवा द्वारा अपने वश में ले आती हैं, सच्चे भक्त, जो सभी के लिए समान हैं और मेरे प्रति पूरी तरह से हृदय की गहराइयों में जुड़े होते हैं, मुझे अपने पूर्ण नियंत्रण में ले आते हैं।” (भागवतम् 9.4.63, 66)
उद्धव ने श्री कृष्ण से भी ऐसे ही शब्द सुने थे:
न तथा मे प्रिय-तम
आत्म-योनिर्नशंकरः
न च संकर्षणो न श्रीः
नैवात्मा च यथा भवान
“मेरे प्रिय उद्धव, न तो भगवान ब्रह्मा, न भगवान शिव, न भगवान संकर्षण, न भाग्य की देवी, और न ही वास्तव में मेरा अपना ही स्वरूप तुम जैसा प्रिय है।” (भागवतम् 11.14.15) श्रील सनातन गोस्वामी ने टिप्पणी की है कि भागवतम के इस श्लोक में, श्री कृष्ण का उद्देश्य यह सामान्य बयान देना था कि कोई और उनके लिए उनके शुद्ध भक्तों जितना प्रिय नहीं है, लेकिन क्योंकि कृष्ण अपने भक्तों के विशिष्ट गुणों के बारे में सोचते हुए बहुत खुशी से भर गए थे, इसलिए “मेरे भक्त” कहने के बजाय उन्होंने अनजाने में “तुम, उद्धव" कह दिया।
