श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  1.3.60 
नारदाहम् इदं मन्ये
तादृशानां यतः स्थितिः
भवेत् स एव वैकुण्ठो
लोको नात्र विचारणा
 
 
अनुवाद
प्रिय नारद, मेरी राय में, जहाँ भी ऐसे भक्त मिलते हैं, वह वास्तव में वैकुंठलोक है। इस तथ्य के विरुद्ध तर्क करना व्यर्थ होगा।
 
Dear Narada, in my opinion, wherever such devotees are found, that is truly Vaikunthaloka. Arguing against this fact would be futile.
तात्पर्य
भगवान शिव के लिए पृथ्वी या कहीं और रह रहे शुद्ध वैष्णव वैकुंठ के निवासियों से कम गौरवशाली नहीं हैं। वैष्णवों को इस आधार पर कभी नहीं आंका जाना चाहिए कि वे भगवान विष्णु के राज्य में रहते हैं या नहीं, क्योंकि जिसके पास प्रेम-भक्ति का खजाना है, उसके पास भगवान हमेशा रहते हैं। स्वयं भगवान ने कहा है:

नाहं वसामी वैकुंठे

ना योगी-हृदये रवौ

मद-भक्ता यत्र गायंति

तत्र तिष्ठामि नारद

"मैं वैकुण्ठ में नहीं रहता, न योगियों के ह्रदय में, न सूर्य के अंदर। बल्कि, मेरे प्रिय नारद, मैं जहाँ भी मेरे भक्त मेरे बारे में गाते हैं, वहाँ उपस्थित रहता हूँ।" (पद्म पुराण, उत्तर-खंड 92.21-22)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)