नाहं वसामी वैकुंठे
ना योगी-हृदये रवौ
मद-भक्ता यत्र गायंति
तत्र तिष्ठामि नारद
"मैं वैकुण्ठ में नहीं रहता, न योगियों के ह्रदय में, न सूर्य के अंदर। बल्कि, मेरे प्रिय नारद, मैं जहाँ भी मेरे भक्त मेरे बारे में गाते हैं, वहाँ उपस्थित रहता हूँ।" (पद्म पुराण, उत्तर-खंड 92.21-22)
