श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.3.52 
स वैकुण्ठस् तदीयाश् च
तत्रत्यम् अखिलं च यत्
तद् एव कृष्ण-पादाब्ज-
पर-प्रेमानुकम्पितम्
 
 
अनुवाद
वह वैकुण्ठ लोक, उसके निवासी तथा वहाँ की प्रत्येक वस्तु कृष्ण के चरणकमलों के प्रति शुद्ध प्रेम की दया से धन्य है।
 
That Vaikuntha planet, its inhabitants and everything therein are blessed by the mercy of pure love for the lotus feet of Krishna.
तात्पर्य
इसके विपरीत, प्रभु शिव इशारा करते हैं कि, उनका अपना ग्रह व अन्य भौतिक जगत में कृष्ण प्रेम का आशीर्वाद नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)