| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार » अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे) » श्लोक 5-6 |
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| | | | श्लोक 1.3.5-6  | अथ श्री-रुद्र-पादाब्ज-
रेणु-स्पर्शन-काम्यया
समीपे ’भ्यागतं देवो
वैष्णवैक-प्रियो मुनिम्
आकृष्याश्लिष्य सम्मत्तः
श्री-कृष्ण-रस-धारया
भृशं पप्रच्छ किं ब्रूषे
ब्रह्म-पुत्रेति सादरम् | | | | | | अनुवाद | | नारद जी वैष्णवों के परम मित्र भगवान शिव के चरणकमलों की धूलि को स्पर्श करने की आशा में निकट आए। किन्तु जैसे ही ऋषि निकट आए, कृष्णभावनाभावित आनंद से उन्मत्त भगवान शिव ने बलपूर्वक नारद को अपने निकट खींच लिया और उन्हें गले लगा लिया। बिना किसी हिचकिचाहट के उन्होंने नारद से आदरपूर्वक पूछा, "हे ब्रह्मापुत्र, आप क्या कह रहे हैं?" | | | | Narada approached Lord Shiva, the ultimate friend of Vaishnavas, hoping to touch the dust of his lotus feet. But as the sage approached, Lord Shiva, intoxicated with Krishna-conscious joy, forcefully pulled Narada close and embraced him. Without hesitation, he respectfully asked Narada, "O son of Brahma, what are you saying?" | |
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