श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.3.45 
तत्र ये सच्-चिद्-आनन्द-
देहाः परम-वैभवम्
सम्प्राप्तं सच्-चिद्-आनन्दं
हरि-सार्ष्टिं च नाभजन्
 
 
अनुवाद
वैकुंठवासियों के पास सच्चिदानन्द शरीर है और वे भगवान हरि के परम ऐश्वर्य का लाभ उठा सकते हैं। उनके पास सच्चिदानन्द शक्तियाँ हैं, जो उनके समान हैं। किन्तु वैकुंठवासी भगवान के साथ ऐसी समानता स्वीकार नहीं करते।
 
The residents of Vaikuntha possess Sachchidananda bodies and can enjoy the supreme opulence of Lord Hari. They possess Sachchidananda powers, which are equal to His. However, the residents of Vaikuntha do not accept such equality with the Lord.
तात्पर्य
वैकुंठ के निवासी अपने निजी शारीरिक रूप रखते हैं, किन्तु ये भौतिक माया के रूप नहीं होते। जैसे कि युधिष्ठिर महाराज ने नारद मुनि से एक प्रश्न करते हुए कहा कि ''देहेन्द्रियसु-हीनानाम वैकुंठ-पुरा-वासिनाम'' : "वैकुंठ में रहने वालों के शरीर पूर्णतया आध्यात्मिक होते हैं, जिनका भौतिक शरीर, इंद्रिय या जीवन वायु से कोई लेना-देना नहीं होता।'' (भागवत 7.1.35)

वैकुंठ-वासी अलौकिक होते हैं और इसी प्रकार उनकी बाहरी संपन्नताएं भी होती हैं। प्रत्येक निवासी में लाखों भौतिक ब्रह्मांडों और उनके आवरण रूपी खोलों में उपलब्ध शक्ति और संपत्ति से कहीं अधिक शक्ति और संपत्ति होती है। वैकुंठ-वासी बिना किसी प्रयास और बिना किसी सीमा की प्राप्ति करते हैं, ये संपन्नताएं आध्यात्मिक, शाश्वत और बिल्कुल वास्तविक हैं। ये परम भगवान की दिव्य ऊर्जा का विस्तार हैं और इसलिए ये सभी अत्यंत अभीष्ट और विविधता से भरी हुई हैं। इस तथ्य के तार्किक और शास्त्रीय प्रमाण श्री ब्रह्द-भागवत अमृत में आगे प्रस्तुत किये जाएँगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)