श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.3.44 
त्यक्त-सर्वाभिमाना ये
समस्त-भय-वर्जितम्
वैकुण्ठं सच्-चिद्-आनन्दं
गुणातीतं पदं गताः
 
 
अनुवाद
उन भक्तों ने सभी प्रकार के मिथ्या अभिमान को त्याग दिया है। और उन्होंने भौतिक गुणों से परे और सभी भयों से रहित, वैकुंठ लोक को प्राप्त कर लिया है, जो सच्चिदानन्द है - जो शाश्वतता, ज्ञान और आनंद से पूर्ण है।
 
Those devotees have renounced all false pride and have attained the Vaikuntha planet, which is Sachchidananda—full of eternity, knowledge, and bliss—beyond material qualities and devoid of all fear.
तात्पर्य
वैकुण्ठ धाम के निवासी न केवल भौतिकवादियों, मुक्ति के उम्मीदवारों और मुक्त आत्माओं से बल्कि स्वयं भगवान शिव से भी श्रेष्ठ हैं, जो मुक्तिदाता हैं। स्वयं के बारे में अपने दृष्टिकोण के अनुसार, भगवान शिव अहंकार के प्रभाव के अधीन हैं, जबकि वैकुण्ठ में भक्त इस दोष से मुक्त हैं। अहंकार से मुक्ति के कारण, वैष्णव वैकुंठ प्राप्त करते हैं, जो एक विशिष्ट स्थान होने के बावजूद भौतिक दुनिया के स्थानों की तरह अस्थायी और भ्रामक नहीं है। वैकुंठ का शाश्वत अस्तित्व शुद्ध चेतना से भरा है और असीमित रूप से संतोषजनक आनंद है। इसमें भौतिक अस्तित्व के प्रतिबंध नहीं हैं।

कई पुराण वैकुंठ की पूर्णता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, श्री नारद पंचरत्र में ब्रह्मा और नारद के बीच बातचीत में, हम जीतं-ते-स्तोत्र में पढ़ सकते हैं:

लोकं वैकुण्ठ-नामानं

दिव्य-षड्-गुण-संयुतं

अवैष्णवानम प्राध्यम

गुण-त्रय-विवर्जितम्

नित्य-सिद्दैः समकीर्णः

तन-मयैः पंच-कालिकैः

सभा-प्रासाद-संयुक्तं

वनैश चोपवनैः शुभम

वापी-कूप-तडागाईश् च

वृक्ष-षणडैः सु-मंडितम्

अप्राकृतः सुरैर वंद्यम्

अयुतार्क-सम-प्रभम्

"अवैष्णवों के लिए प्राप्त करना असंभव, वैकुंठ नामक दुनिया तीन भौतिक गुणों से रहित है और छह दिव्य गुणों से पूर्ण है। यह शाश्वत रूप से परिपूर्ण आत्माओं से समृद्ध है, जिन सभी में वो छह समान गुण हैं और जो जीवन की पाँच विभिन्न आयु में प्रकट होते हैं। समृद्ध वैकुंठ कई महलों और विधानसभा हॉल और कुओं, टैंकों, तालाबों, उद्यानों, वनों और पेड़ों के उपवनों से सुशोभित है। वह दिव्य दुनिया, जिसे देवताओं द्वारा पूजा जाता है, दस हजार सूर्य से अधिक चमकदार होती है।"

ब्रह्मांड पुराण में:

अम अनांत-गुणावासम

महात-तेजो दुरासदम

अप्रत्यक्षम निरूपमम

परानंदम अतिंद्रियम्

"यह अनगिनत आध्यात्मिक गुणों का निवास है, अप्राप्य सर्वोच्च प्रकाश की दुनिया है। इसे भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है, न ही ज्ञात किसी चीज़ से तुलना की जा सकती है। यह अत्यधिक उत्ताप है और इंद्रियों के दायरे से परे है।"

श्रीमद - भागवतम् में, द्वितीय काण्ड (2.9.9-10):

तस्मि स्व-लोकं भगवान सबाजितः

संदर्शयाम आसा परम न यत्-परम

व्यपेत-संक्लेश-विमोहा-साध्वसम

स्व-दृष्टवद्भिः पुरुषैरभिष्टुतम्

प्रवर्तते यत्र रज तमस तयोः

सत्त्वं च मिश्रं न च काल-विक्रमः

न यत्र माया किम तापरे हरर

अनुव्रता यत्र सुरासुरार्चितः

"भगवान ब्रह्मा की तपस्या से बहुत संतुष्ट, भगवान् भगवान प्रसन्न हुए और अपना निजी निवास, वैकुंठ, जो अन्य सभी ग्रहों से परम है, उसे प्रकट किया। भगवान का यह दिव्य निवास सभी आत्म-साक्षात्कार व्यक्तियों द्वारा पसंद किया जाता है जो सभी दुखों और भ्रम के अस्तित्व के भय से मुक्त हैं। भगवान के उस व्यक्तिगत निवास में, अज्ञानता और जुनून के भौतिक तरीके प्रबल नहीं होते हैं, और उनका अच्छाई पर कोई प्रभाव नहीं होता है। समय के प्रभाव की कोई प्रबलता नहीं है, तो भ्रामक, बाहरी ऊर्जा की बात क्या है; वो उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती है। बिना भेदभाव के, देवता और राक्षस दोनों भक्तों के रूप में भगवान की पूजा करते हैं।"

और दसवें काण्ड में (10.28.14-15):

इति संचिन्त्य भगवान

महा-कारुणिको हरिः

दर्शयाम आसा लोकम स्वम

गोपानम तमसः परम

सत्यम ज्ञानम अनंतं यद

ब्रह्म-ज्योतिः सनातनम

यद धि पश्यन्ति मुनयो

गुणापाये समाहिताः

"इस प्रकार गाय चराने वाले लोगों की स्थिति पर गहराई से विचार करते हुए, सर्व-दयालु सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान हरि ने उन्हें अपना निवास स्थान दिखाया, जो भौतिक अंधकार से परे है। भगवान कृष्ण ने अविनाशी आध्यात्मिक तेज का खुलासा किया, जो असीमित, चेतन और शाश्वत है। ऋषि उस आध्यात्मिक अस्तित्व को तल्लीनता में देखते हैं, जब उनकी चेतना भौतिक प्रकृति के प्रकार से मुक्त होती है।"

ये छंद वैकुण्ठ की पहचान ब्रह्म-ज्योतिः से करते हैं, सर्व-व्यापी सर्वोच्च का तेजस्वी प्रकाश - यानी, उसी निरपेक्ष अस्तित्व के साथ जो उपनिषदों में ब्राह्मण नाम से वर्णित है। बुद्धि की दृष्टि से, आत्म-संतुष्ट ऋषि (मुनि) वैकुंठ की परिकल्पना करते हैं, लेकिन वे इसे प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)