श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.3.18 
अहो विचित्र-गम्भीर-
महिमाब्धिर् मद्-ईश्वरः
विविधेष्व् अपराधेषु
नोपेक्षेत कृतेष्व् अपि
 
 
अनुवाद
"ओह, मेरे प्रभु कितने शांत हैं। वे महान गुणों का कितना गहरा और विविध सागर हैं। हालाँकि मैंने उनके विरुद्ध अनेक प्रकार के अपराध किए हैं, फिर भी वे मुझे अस्वीकार नहीं करते।"
 
"Oh, how peaceful my Lord is. What a deep and varied ocean of great virtues He is. Even though I have committed many offenses against Him, He still does not reject me."
तात्पर्य
सागर इतना गहरा है कि एक इंसान उसे नाप ही नहीं सकता, तो उसके अंदर डुबकी लगाकर उसके तल तक पहुँचने की तो बात ही क्या। सागर अपनी निर्धारित जगह से हिलाया भी नहीं जा सकता और दूसरा किनारा किसी की भी दृष्टि से परे है। इसी प्रकार, परम भगवान के गुण अनगिनत हैं, उनमें हर तरह की महानता शामिल है और उनके हर गुण की कोई सीमा नहीं है।

भगवान शिव ने भगवान कृष्ण को आशीर्वाद देकर अपनी ताकत दिखाई थीं, जिसे लेकर वो खुद को अपराधी मान रहे थे। उन्होंने भगवान के खिलाफ और भी अपराध किये थे जिन्हें याद कर उन्हें काफी तकलीफ होती है। लेकिन श्री कृष्ण ने कभी भी भगवान शिव के द्वारा किए गए किसी काम को अपराध नहीं माना, क्योंकि भगवान शिव इस दुनिया में हमेशा कृष्ण की भक्ति को बढ़ाने के लिए काम करते हैं, चाहे वो सीधा हो या अप्रत्यक्ष।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)