भजे भज्जन्यारण-पाद-पंकजम्
भगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम्
भक्तेष्व आलम् भाविता-भूत-भावनम्
भवपहं त्वा भव-भावम ईश्वरम्
“हे मेरे भगवान, आप ही पूजा करने के योग्य व्यक्ति हैं, क्योंकि आप भगवान के परम व्यक्तित्व हैं, सभी ऐश्वर्यों के भंडार हैं। आपके सुरक्षित कमल चरण ही आपके सभी भक्तों के सुरक्षा का एकमात्र स्रोत हैं, जिन्हें आप अपने विभिन्न रूपों मे प्रकट होकर संतुष्ट करते हैं। हे मेरे भगवान, आप अपने भक्तों को भौतिक अस्तित्व के चंगुल से मुक्ति दिलाते हैं। लेकिन गैरभक्तगण आपकी इच्छा से ही भौतिक अस्तित्व मे उलझे रहते हैं। कृपया मुझे अपने अनंत सेवक के रूप मे स्वीकार करें।”
क्योंकि भगवान शिव भगवान के व्यक्तित्व के अवतार हैं, और भगवान शिव और भगवान के व्यक्तित्व इसलिए एक ही हैं, तो भगवान शिव को भौतिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर शुद्ध होने के लिए भगवान संकर्षण की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है। भगवान शिव भक्तिपूर्ण सेवा के पारलौकिक स्वाद के बारे मे संसार को शिक्षित करने के लिए आम उपकरणों के साथ बाहरी रूप से पूजा करते हैं।
ब्रह्मा को भी भगवान का अवतार माना जाता है, लेकिन शिव और ब्रह्मा दोनों की स्थिति समान नहीं हैं। भगवान शिव विष्णु से एक अधिक शाब्दिक अर्थ मे भिन्न नहीं हैंः ब्रह्मा का पद लगभग हमेशा एक जीवी के द्वारा ही ग्रहण किया जाता है, जबकि कोई भी जीव कभी भी शिव की अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता।
प्रकट शास्त्रों के कई कथन भगवान शिव को भगवान विष्णु से भिन्न रूप मे नहीं मानते हैं। उदाहरण के लिए, पदम पुराण (ब्रह्म-खंड 25.15) मे, भगवान विष्णु के पवित्र नामों के ख़िलाफ़ दस अपराधों के वर्णन मे, हम पढ़ते हैंः
शिवस्य श्री विष्णोर य इह गुण-नामदि-सकलम
धिया भिन्नं पश्येत स खलु हरि-नामहित-करः
“जो कोई भी भगवान शिव के गुणों और नामों और श्री विष्णु के गुणों और नामों मे कोई अंतर देखता है, वह हरि-नाम का विरोधी है।” ब्रह्मा और विष्णु की भिन्नता के बारे मे इस तरह का कोई आदेश नहीं है।
अधिकृत शास्त्रों मे कहा गया है कि वसिष्ठ जैसे व्यक्ति, जो कि निश्चित रूप से परिमित जीव हैं, भविष्य के जीवन मे अपने ब्रह्मांड मे भगवान ब्रह्मा बनेंगे। सैद्धांतिक रूप से कोई भी जीव आत्मा ब्रह्मा के पद को प्राप्त कर सकता है। जैसा कि भगवान शिव ने प्रचेताओं को बताया थाः
स्व-धर्म-निष्ठः शत-जन्मभिः पुमान
विरंचताम एति ततः परम् हि माम
“एक व्यक्ति जो बिना किसी विचलन के, सौ जन्मों तक अपने कार्यगत कर्तव्य का पालन करता है, वह ब्रह्मा के पद को लेने के योग्य बन जाता है, और यदि वह इससे अधिक योग्य बन जाता है तो वह मेरे, भगवान शिव के करीब आ सकता है।” (भागवत 4.24.29) इन शब्दों का कथन है कि एक जीव भगवान शिव मे शामिल हो सकता है, यह नहीं कि वह शिव बन सकता है। नारद ने भगवान शिव को परमेश्वर की कृपा के प्राप्तकर्ताओं की अपनी खोज मे शामिल किया है क्योंकि भगवान शिव अपने भक्त रूप मे भगवान का एक विशेष अवतार हैं।
लॉर्ड शिव के अनुयायी जिन्हें नारद ने शिवलोक मे देखा, वे सभी महान वैष्णव थे जिन्होंने अपने गुरु के विष्णु-भक्ति के भाव को गहराई से आत्मसात किया। भगवान शिव ने विशेष रूप से उनकी कलात्मक संपत्ति की प्रशंसा की, विशेष रूप से उनकी पत्नी पार्वती की ताली बजाने की, क्योंकि उनका प्रदर्शन सीधे शुद्ध भक्ति से ही प्रकट हुआ था।
यह सब देखकर नारद भी पागल हो गया। वह इतने उत्साह से नाचे कि वह दंडवत प्रणाम नहीं कर सके, और चूँकि वह अपनी वीणा बजाना बंद नहीं करना चाहते थे, उन्होंने बस अपना सिर हिलाकर सम्मान व्यक्त किया। फिर, भगवान शिव के व्यवहार की स्वीकृति दिखाने के लिए कुछ कहना चाहते हुए, उन्होंने ब्रह्मा द्वारा उन्हें बताई गई भगवान शिव की महिमा के बारे मे बताना शुरू किया।
